विषय : आपके विवेकनुसार ...

 



व्यक्ति बेईमान है और इतना बेईमान हैं कि, कभी कभी स्वयं से भी बेईमानी करता है लेकिन प्रश्न है क्यों ?  क्योंकि क्षमता नहीं हैं उसमें स्वीकारने की। स्वीकरण जो उससे छीन लेगा उसके तथाकथित भरम, उसके बुने हुए सपनों के जाल, जो उसकी बुद्धि की उपज है , बुद्धि जो संग्रहण करने का एक स्थान है जिसमें संग्रहित हैं भूत की यादें, भविष्य की बाते  और उधार की सौगात । उधार से मतलब बाहर से भीतर आई हुई धारणाएं , हृदय पर आरोपण मस्तिष्क का । 


और ये आरोपण भेंट हैं समाज की। क्योंकि समाज कभी कभी व्यक्ति को पाखंडी बना देता है, समाज कभी स्वीकार नहीं करेगा उसकी बनी बनाई व्यवस्था टूट जाए । समाज बुद्धि का ही एक फैलाव है सामूहिक रूप में समाज नही चाहता । चंद  लोगों का एकाधिकार और विशेषाधिकार समाप्त हो जाए। कभी जरा से सम्मान के लिए ,कभी लाभ के लिए , कभी भय से तो कभी अन्य किसी कारण से व्यक्ति स्वीकारता है, समाज !  लेकिन जिस कीमत पर वह कीमत होती हैं दमन "जीवन और आत्मा का "।


ठीक वैसे जब पांडवो ने मांग की थी बस पांच ग्राम की लेकिन कौरवों ने मना कर दिया परिणाम महाभारत !

सर्वस्व तांडव और सर्वनाश। बुद्धि वह परत हैं जिसके समक्ष स्वयं परमात्मा प्रकट हो तो भी वह ईश्वर से प्रमाण मांगेगी की परमात्मा होने का सबूत दो।



ये पहलू भले ही सामाजिक प्रतीत हो पर निपट असामाजिकता लिए हुए हैं। इनके मूल में हैं आरोपण । और जिस वृक्ष की जड़ में समस्या हो वह वृक्ष स्वस्थ कहा हो सकता है। तब इसके दूरगामी परिणाम विध्वंसकारी होते हैं । मजबूरी में दबा हुआ व्यक्ति अवसर मिलने पर या सशक्त होने पर हावी होता है। तो जो व्यक्ति आज समाज से कुंठित है वह जब योग्य होगा तब उसकी कुंठा ना केवल समाज के उस तल का नाश करेगी , जिससे वह पीड़ित हुआ बल्कि उसे भी नहीं बक्शेगी।  जिसका इस घटना से कोई नाता नहीं और फिर यह क्रम एक कुचक्र का रूप ले लेगा। और चक्र का स्वभाव होता है उसी  बिंदु का बार बार दोहराव यानी ♾️ ।  अनंत सदृश संख्या 8 जिसका न कोई ओर होता हैं ना छोर । और गति के नियम में जैसा होता हैं यानी जब तक कोई बाहरी बल इसे नहीं रोकता तब तक  उसका रुकना संभव नहीं। इसलिए आवश्यक है कि इस कुचक्र को तोड़ा जाए। जो केवल आत्मवानों से संभव है। जो गुणात्मक हो गणनात्मक नहीं ऐसे लोगो का

विकास हो यानी आत्मवानो का, लोग हो आत्मवान, जीवन भीतर से बाहर की ओर हो। बाहर से भीतर की ओर नहीं । ऐसा व्यक्ति प्रमाणिक होगा आडंबरी नहीं। तब ऐसा व्यक्ति आदर्श और प्रेरणास्त्रोत होगा । लेकिन वह भावना केवल भीतर से ही आ सकती हैं।  और समाज आपको ईश्वर का मूल रूप नहीं बता सकता क्योंकि वो केवल सत्य से संभव है और समाज व्यक्ति को आडंबरी बनाकर उस परमसत्य से वंचित रखना है ऐसे में यह व्यक्ति की प्राथमिकता हों कि, वह सत्य का चुनाव करें और सत्य और परमात्मा दोनो एक हैं।


इसीलिए किसी भी विधा किसी भी धर्म किसी भी समुदाय में व्यक्ति को सिखाई जाती हैं रिक्तता । नाम जप हो या मौन ध्यान अभ्यास नितांत शांत अवस्था को प्राप्त करने का होता है।  द्वंदातीत अवस्था यानी द्वंद से परे उस अवस्था में जहां व्यक्ति बस होता है। अपने सभी पूर्वाग्रह से इतर अपनी आशाओं से विलग। उसी अवस्था में जाना ही हर धर्म का लक्ष्य हैं।  जहां व्यर्थ के संघर्ष ना हो। 


क्योंकि शांति उस संघर्ष की परत को तब निष्क्रिय कर देती हैं । जब व्यक्ति किसी एक कार्य में बहुत लिप्त हो जाता हैं । फिर घटता हैं विस्मरण यानी शांति । इसलिए ध्यान रखना चाहिए व्यक्ति को कि, कोई कितना भी बुद्धि को सर्वोपरि कहे लेकिन मुख्य निर्णय का कार्य हृदय का हैं । 

आत्मा का हैं। मस्तिष्क यानी बुद्धि आखिरकार हृदय के निर्णय के क्रियान्वयन का ही कार्य कर सकती हैं।  मतलब फैसले तो दिल ही लेता है दिमाग बस उस फैसले पर अटल रहने का कार्य करता है मानव जीवन की गाथा खंगाल लीजिए ।


जिन निर्णयों की तह में मस्तिष्क मिला है उन निर्णयों में बंजर मन मिले हैं.... मिली है तबाही ! मस्तिष्क सुविधा चुनता है जो वास्तविक  सुख नहीं है।  हिटलर का निर्णय मस्तिष्क से उपजा , परिणीति  - विश्व संग्राम। अगर हिटलर अपने हृदय की सुनता और चित्रकारी चुनता तो शायद इतने विनाश में भागी ना होता। जानकार जानते हैं कि, उसके पिता चित्रकारी के विरोध में थे परिणाम जगजाहिर है... दमन कभी कल्याणकारी नहीं हो सकता...

विषय : आपके विवेकनुसार ... विषय : आपके विवेकनुसार ... Reviewed by Abhinav soni on 2/12/2024 Rating: 5

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