आम जनता के स्वास्थ्य और सुरक्षा की ओर ध्यान देते हुए व्यापक व्यवस्था किया जाना छोड़ लोगों के मध्य भय, भूख व बेरोजगारी की स्थिति उत्पन्न करना लोकतांत्रिक व्यवस्था की असफलता दर्शाता है।
यदि लॉक डाउन ही करना है तो पहले आम जनता की आजीविका खानपान की व्यवस्था कर देते लोगों की अर्थव्यवस्था पर ध्यान देते जनाब आपको फर्क नहीं पड़ता क्योंकि इसी जनता के पैसों से मिलने वाले टैक्स से आपको वेतन भत्ता और मुफ्त में गाड़ियां मिल रही है। लेकिन जिनके पास सरकारी धन आने की व्यवस्था नहीं है जो दैनिक रोजी व्यापार कर बड़ी मुश्किलों से अपना घर चलाते हैं उनका क्या ?
लॉक डाउन के नाम पर कालाबाजारी व मुनाफाखोरी चरम पर रहते हुए अख़बारों की सुर्खियां रही। सामान्य सी सब्जियां जो 10 से 20 रुपए किलो पर मिलती थी वे 80 से 100 रुपए किलो पर बिकती रही। पंपों से पेट्रोल गायब हो गए लेकिन प्रशासन इन पर पूर्ण नियंत्रण पाने में असमर्थ रहा। गांजा-शराब व नशीली वस्तुओं का कारोबार भी सुर्ख़ियों में पीछे नहीं रहा। लॉक डाउन की व्यवस्था ने अवसरवादी व्यापारियों पर कृपा बरसायी जिसका भुगतान आम जनता को करना पड़ा। स्वाभाविक बात है कि यदि जिले में आवागमन के सभी साधन बंद है तो एकमात्र सहारा निजी साधन बचता है उस पर भी साहब द्वारा इधन स्त्रोत/पेट्रोल पर पाबन्दी लगा दी गई अब यदि आम जनता के समक्ष कोई आवश्यक कार्य आए या कोई व्यक्ति संक्रमण के दौर से गुजरे तो उसके समक्ष विकल्प क्या है ?
महामारी की जिस गंभीर त्रासदी को लेकर तालाबंदी का पक्ष रखा जा रहा है उक्त परिस्थितियों में यह बेमानी है। आम जनता से जुड़े मुद्दों पर यदि प्रशासन निर्णय लेने में समर्थ है तो लोकतंत्र के नाम पर चुने हुए जनप्रतिनिधियों की क्या आवश्यकता है। ऐसे निर्णय लेने वाली व्यवस्था ने यह साबित कर दिया है कि वे असफल है। और आम जनता को धकेल दिया, अघोषित आपातकाल में। जब राज्य के एक जनप्रतिनिधि मंत्री ने कहा कि अब लॉकडाउन नहीं होगा, प्रशासन ने लॉकडाउन कर दिया। इससे स्पष्ट है कि वर्तमान राज में प्रशासन हावी है और जनप्रतिनिधि सिर्फ कुर्सी तोड़ व वेतन भत्तो के लिए ! लॉकडाउन के नाम पर कालाबाजारी खुलेआम चलती रही, जिन्हें कालाबाजारी ,मुनाफाखोरी रोकना था वे तालाबंदी करने पर लगे हैं और जिन्हें तालाबंदी पर फैसला लेना था वे भीष्म की भाँति हाथ बांधे क्वारंटाइन के नाम पर अपने घरों पर बंद हैं।
जिन्हें संकटकाल में आम जनता के सामने आने से डर लगता हैं वे लोकतंत्र के लायक नहीं, और यदि सारा काम जिला प्रशासन कर सकता हैं तो विधायक, मंत्री सहित हज़ारों जनप्रतिनिधियों की आवश्यकता क्या है ?
जिस राज्य में प्रशासन के भरोसे लोकतांत्रिक व्यवस्था से सम्बंधित कार्यसंचालन हो सकता हैं। उस राज्य को जनप्रतिनिधि पर करोडो रूपए बर्बाद करने की क्या आवश्यकता है।
यदि लोकतांत्रिक व्यवस्था आम जनता के स्वास्थ और सुरक्षा की पूर्ण व्यवस्था न कर अघोषित आपातकाल की स्थिति उत्पन्न कर रही है तो निश्चित रुप से राज्य में आपातकाल होना चाहिए।
आम जनता के स्वास्थ्य और सुरक्षा की ओर ध्यान देते हुए व्यापक व्यवस्था किया जाना छोड़ लोगों के मध्य भय, भूख व बेरोजगारी की स्थिति उत्पन्न करना लोकतांत्रिक व्यवस्था की असफलता दर्शाता है। जो व्यवस्था आम जनता के स्वास्थ और सुरक्षा की उचित व्यवस्था नहीं कर सकती उसे राज्य में शासन का क्या अधिकार ?
जिस राज्य में पेट्रोल पंप का कर्मचारी पत्रकार डॉक्टर और शासकीय कर्मचारियों का परिचय पत्र देखें और यह निश्चित करें कि उसे पेट्रोल देना है या नहीं उस राज्य का भगवान ही मालिक है।
हमने सुना था आईएएस, आइपीएस बनने के लिए बहुत पढ़ाई करनी पड़ती है, परीक्षा देनी पड़ती है। कोई विद्वान परिश्रमी ही आईएएस /आईपीएस बन सकता है लेकिन आजकल जैसे नियम लागू हो रहे हैं उससे तो यह प्रतीत होता है कि माननीय मुख्यमंत्री की गोधन न्याय योजना ही अच्छी है कम से कम हमें यह तो पता ही होगा कि पढ़ा-लिखा युवक गोबर का व्यवसाय कर रहा है, गोधन बुद्धि का परिश्रम नहीं ?
पेट्रोल पम्पों पर कर्मचारियों को इतनी महत्ता देने से यह भी स्पष्ट हो गया है कि बड़े-बड़े समाचार पत्रों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर शासन प्रशासन पर लिखने वालो, आपका परिचय पंप के बैठने वाले कर्मचारी के फैसले पर निर्भर है ,वह तय करेगा कि तुम्हें पेट्रोल देना है या नहीं ? यह तो गंभीर स्थिति हो गई कि पत्रकारों को पेट्रोल पंप पर भी अपना परिचय देना पड़ रहा है जो एक आवश्यक वस्तु है तथा हम सभी उपभोक्ता हैं, यह तो ऐसा हो गया की दुकान चालू है, हमारी मर्जी हमें सामान किसे देना है किसे नहीं ? तो जनाब आम जनता तो लोकतंत्र का आधार है इसे यह अधिकार कब मिलेगा कि जो जनता के स्वास्थ और सुरक्षा की व्यवस्था ना कर सके उसे बेरोजगारी के आलम में धकेल कर उसे भूखे मरने की नौबत तक पहुंचा दे उसे तत्काल उनकी सेवा से मुक्त कर दे ।
यह भी गौरतलब है कि महामारी में छह माह से भी अधिक समय हो गए और शासन प्रशासन मिलकर विगत 6 माह में यह व्यवस्था नहीं कर पाया कि लोगों की नियमित और उचित स्वास्थ और सुरक्षा की पर्याप्त व्यवस्था हो।
Reviewed by Abhinav soni
on
9/28/2020
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