ना जाने कैसा अन्तरा हैं वो ... ?
वो माया में भी मरा , वो काया से भी मरा ।
कि, मरण ही तो रहा, जीवन उसका ।।
कि, फिर भी ना , करण हुआ हैं वो ।
चरण दर चरण में, बस मरा हैं वो ।।
तपा बहुत इस प्रवीणता की भट्टी में ।
मगर कभी ना उतरा , खरा हैं वो ।।
मानो एक बंजर , धरा हैं वो ।
हा हुआ नही , नसीब नर्क उसे ।।
पर भव से भी, तो ना तरा हैं वो ।
इस लोक में भी, हैं अलौकिक ।।
और उस लोक से भी, परा हैं वो।
ना जाने कैसा अन्तरा हैं वो ?
ना जाने कैसा अन्तरा हैं वो...
ना जाने कैसा अन्तरा हैं वो ... ?
Reviewed by Abhinav soni
on
9/09/2023
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