मानवता की बात न छेड़ो...



मानवता की बात न छेड़ो।

ना छेडो थोथे थाप यहाँ।।

चेहरों की तो बात ना छेड़ो ।
तुम ठहरे 
अनजान यहां।।

हमने देखे हैं हर चेहरे के।
, सैकड़ो परवान यहाँ।।

कहे कुछ ,कुछ और दिखाए ।
कर जाए कुछ, ऐसे तो इंसान यहाँ।

सुखी नदी की रेत में अब तुम।
कैसे फसल लगाओगे।।

हृदय हुए जो पत्थर माफिक ।
यहां तो कैसे पिघलाओगे।।

ऐसी करुणा धार यहां तुम ।
बोलो ! कहाँ से लाओगे।।

सूरज जैसा तेज कहा।
जो अंधकार मिटाओगे।।

लावा जैसी तपिश शेष बस।
बस भसम ही तुम कर पाओगे।।

राख से ज्यादा आखिर क्या ।
फिर तुम दामन में ले जाओगे।।

समा ना होगा रोशन इससे ।
बोलो! कैसे अंधकार मिटाओगे।।

अब तक तो थे इंसान यहाँ ।
अब क्या इन्सान कहलाओगे  ||

जो वाकिफ हो तुम भी,इनसे ।
तो बोलो ! कैसे मुस्काओगे।।

लाख जहमते कर लो आखिर,।
तुम भी ना बच पाओगे।।

जाली मुखड़ों के रकीब शहर में।
कब तक बख्शे जाओगे।।

जो तंग आए तो एक मुखौटा।
तुम भी लेकर आओगे।।

जैसे इनकी वजहे मुनासिब ।
वैसी तुम भी ठहराओगे।।

वजहों की इस फेहरिस्त में ।
इक अर्ज़ी तुम भी लाओगे।।

जो कहते हो इंसान खुदी को ।
तो बोलो क्या ! बच पाओगे ।।

मानवता की एक पताका ।
बोलो ! क्या तुम लहराओगे।।

अपना दामन साबुत आखिर ।
कब तक तुम रख पाओगे।।

जो अनजान हो तो ही अच्छा ।
जो जाना तो मर जाओगे।।

मानवता की बात न छेड़ो... मानवता की बात न छेड़ो... Reviewed by Abhinav soni on 7/29/2022 Rating: 5

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