पथ पर चलना अनुपम वेग...।
ना हो अंतरद्वंद यहां ,हो बस कलरव विवेक।।
कारण मिलेंगे रुकने को बहुतेरे ।
पर चलने को वजह, मिलेगी एक ।।
अपने नयन से कहना हर क्षण । (2)
उन दीवारों से इतर, तू देख...।।
सीढ़ी को उस सीढ़ी को ।
जो जाती हो , शिखर की ओर । ।
उम्मीद से बंज़र मन भूमि में ।
करना उत्साहों का अतिरेक...।।
गति हो इतनी अविरल मन की ।
तेज़ हो इतना उसका वेग... ।।
छाए जैसी छटा निराली।
उपवन के हो जैसे मेघ..।।
साहस बरसे ऐसे जैसे ।
मधुबन में फूलों के सेज...।।
बिखरे प्रतिपल नित नूतन सा,।
परमानंदम सदा सुमेर...।। (2)
पथ पर चलना अनुपम वेग...
Reviewed by Abhinav soni
on
10/27/2022
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