निशदिन जलती कितनी चिताएँ.....




 निशदिन जलती कितनी चिताएँ,

इतने अश्रु  कौन बहाएँ। 


कभी सपने - कभी अपने ... ढहते,

 जीवन पथ पर रहते रहते।


 कभी शोहरत ढहती , कभी ढहती दौलत ,।

 ढहते कितने अरमान यहां। 


कुछ जाने होते, कुछ होते अनजाने 

बर्बादी के पैगाम यहाँ ।


 हर करवट परिवर्तन का,   देता हैं निशान यहां। 


कुछ रह जाते राहों पर , मँजिल तक कुछ आ जाते हैं। 


कितना रोकोगे तुम इनको ,   सैलाब मगर ले आते हैं।।



क्यूं ना लबो पे मुस्कान लाए,   अब रोते रोते , क्यू ना थक जाए।


नया  कोई तरीका  अपनाए  , उस रस्ते  ना अब वापस  जाए   


 गर भरम ही जीवन यहाँ,  तो यही सही, थोड़ा और जीवन भरमाए।

निशदिन जलती कितनी चिताएँ.....  निशदिन जलती कितनी चिताएँ..... Reviewed by Abhinav soni on 2/07/2023 Rating: 5

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