व्यर्थ ही तु चिंता दागे जाए...


व्यर्थ ही तु चिंता दागे जाए।

अस्मत कहा रहमत से आए।।

पनघट पनघट फिरता जाए , ।

फिर भी क्यूं ना चैन है पाए ।।


सुन मेरी गाथा संगवारी, ।

मेरी सी ही ,व्यथा तिहारी।।

ये राग ना तुम अब आगे गाओं । 

असमंजस पे , विराम लगाअेां।।


तोहे पुंकारे अनंत की वाणी , 

फिर क्यूं अटके तेरी गाड़ी।


कदम तनिक जो बढ़़ाएगा प्यारे,

आगे रस्ते जाएगा प्यारे।


खडे़ खडे. ना मिलती मंजिल,

मुश्किल थोड़़ा अंजाम यहा रे, 


मंजिल से दूरी ना ज्यादा ।

मपती है पग  पग से राहे  


इतनी  दूर ना  नजरे ले जाओ  |

फिर हर पग मंजिल पाते जाओ ||


योजन की क्यू योजनाएं ! |

आखिर ,मन ये बनाए जाए  | |


चलते  जा तू  रस्ते - रस्ते  |

मिलेंगे अनुभव के तुझको बस्ते ||


हर बस्ता एक नए बसेरे  |

की नीवं खड़ी कर जाएगा | |


ऐसे बस्तों से , एक बसेरा |

स्वतः ही फिर बस जाएगा ||


बसेगा फिर ऐसा बसेरा |

जो ना उजड फिर पाएगा  ||


फिर संताप हो चाहे जितना  गहरा  |

हर पग में दूर होता रहेगा अन्धेरा ||

व्यर्थ ही तु चिंता दागे जाए...  व्यर्थ ही तु चिंता दागे जाए...  Reviewed by Abhinav soni on 2/09/2023 Rating: 5

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