व्यर्थ ही तु चिंता दागे जाए।
अस्मत कहा रहमत से आए।।
पनघट पनघट फिरता जाए , ।
फिर भी क्यूं ना चैन है पाए ।।
सुन मेरी गाथा संगवारी, ।
मेरी सी ही ,व्यथा तिहारी।।
ये राग ना तुम अब आगे गाओं ।
असमंजस पे , विराम लगाअेां।।
तोहे पुंकारे अनंत की वाणी ,
फिर क्यूं अटके तेरी गाड़ी।
कदम तनिक जो बढ़़ाएगा प्यारे,
आगे रस्ते जाएगा प्यारे।
खडे़ खडे. ना मिलती मंजिल,
मुश्किल थोड़़ा अंजाम यहा रे,
मंजिल से दूरी ना ज्यादा ।
मपती है पग पग से राहे ।।
इतनी दूर ना नजरे ले जाओ |
फिर हर पग मंजिल पाते जाओ ||
योजन की क्यू योजनाएं ! |
आखिर ,मन ये बनाए जाए | |
चलते जा तू रस्ते - रस्ते |
मिलेंगे अनुभव के तुझको बस्ते ||
हर बस्ता एक नए बसेरे |
की नीवं खड़ी कर जाएगा | |
ऐसे बस्तों से , एक बसेरा |
स्वतः ही फिर बस जाएगा ||
बसेगा फिर ऐसा बसेरा |
जो ना उजड फिर पाएगा ||
फिर संताप हो चाहे जितना गहरा |
हर पग में दूर होता रहेगा अन्धेरा ||
Reviewed by Abhinav soni
on
2/09/2023
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