चेतनाएं जब बैकुंठ में बैठे बैठे ऊब गयी ।
तब सारी चेतनाएं महा प्रभु की ओर गई ।।
कहा सभी ने प्रभु से फिर की।
थोड़ा मनोरंजन उपलब्ध कराओ ।।
परम् शान्ति बहुत हुई ।
अब थोड़ा परिवर्तन स्वाद में लाओ।।
प्रभु ने फिर तब अनुरोध पे उनकी।
नया ऐसा संसार बनाया।।
जिस के अंदर फिर।
चेतनाओं ने अपना घर बार बनाया ।।
फिर डूबते हुए माया में ।
मनुष्य ने कारोबार चलाया।।
अपराध कही, कहीं की बदमाशी ।
कही खुद को ही भरमाया ।।
वैकुंठ से जो चेतनाएं ।
थोड़ा मनोरंजन लेने आई थी ।।
देह के जरिए उसने जग में।
उपस्थिति दर्ज कराई थी ।।
तब तो वो भोग का।
आनंद उठाने आई थी।।
देह के जरिये थोड़ा भिन्न पर।
स्वछंद गीत वो गाने आई थी।।
मगर हुईं फिर मुश्किल उनको।
अपना संसार चलाने में।।
सुख तो भाता था उनको।
पर दुःख रास ना आया अपनाने में, ।।
फिर खोज में महासुख को ।
वियोग से आखिर दुःख को।।
अपना अंजाम बनाने को।
निकल पड़े फिर वो।।
वापस बैकुंठ में जाने को।
सब सन्ताप मिटाने को।।
बुद्धत्व अपनाने को।
पर भान में जब वो आये।।
ज्ञान से दो चार हो पाए ।
जाने असली आशियाने को।।
हो चुकी थी देर बड़ी तब,
वापस सहजता से भीतर जाने को।।
फिर खुद को जान के भटका, भुला और बेचारा ।
प्रभु का फिर उन्होंने ततपरता से नाम पुकारा।।
अर्ज़ लगाई प्रभु से फिर ।
के प्रभु हमको पास बुलाओ।।
अब और नहीं है बाकी मन मे।
मनोरंजन की आस हमें।।
अब ज़िद ना करेंगे , ।
परिवर्तन के परिवेश को ।।
मनोरंजन के फिर श्लेष को ।
बस दुख के इस जंजाल से ।।
प्रभु हमको मुक्त कराओ।
जग के मायाजाल से।।
कहा प्रभु ने फिर के तुम ।
तो बड़ी देर से जागे हो।।
देख के सन्देशा दुख का ।
तुम जीवन से भागे हो।।
वरना भोग में तो रहके ।
अब तक तुम ना जागे हो।।
आज आ रहा स्मरण तुमको।
के तुम ब्रह्मविहीन हों।
लगता था तुम तो अबतक ।
जैसे जग में लीन हो।।
माया के इस सफर में ।
तुमने बहुत राग अपनाया है।।
के राग वहीं अब वापसी में।
तुम्हारे आड़े आया है।।
अब मानो मेरी पहले इस।
माया से तुम पार हैं पाओ।।
जब माया से लगे।
नाता शेष नहीं तुम्हारा हैं।।
तो ध्यान में आना फ़िर कहना।
वो जो उद्देश्य तुम्हारा हैं।।
क्योंकि जब देह बनी अभिमानी तो थीं ।
भोग चरम पर वो आई।।
दुःख कही सन्ताप कहीं ।
कहीं वो तमस पर थीं मंडराई।।
अब ऊब के फिर इस जग से।
कहती हैं ये चेतनाए।।
प्रभु फिर एक बारी।
सेवा में हमारी आएं ।।
डूब गए हम, माया मोह में ।
भगवन अब ये ऊहापोह मिटाए ।।
थोड़ी कृपा करके हमको ।
जल्दी ही बैकुंठ बुलाए ।।
निशदिन की इस दौड़ भाग से ।
हमको शीघ्र ही मुक्त कराए ।।
इतने अनुनय पर प्रभु ने फिर ।
अपना सन्देशा भिजवाया ।।
देवदूत के माध्यम से फिर प्रभु ने।
मुक्ति का किस्सा बतलाया।।
कहा जब इस धरा पे तुम्हारा कोई विषय ना शेष होगा।
तभी परम् द्वार में बच्चे तुम्हरा परवेश होगा।।
जब चित्त होगा आनंद परम् में ,ना उसमे कोई द्वेष होगा।
जब थिरता से परिपूर्ण तुम्हारा ,ये परिवेश होगा।।
इच्छाओं का ना तनिक भी कोहरा, उसमें ना जब शेष होगा।
तभी परम् द्वार में बच्चे, तुम्हरा परवेश होगा.....
Reviewed by Abhinav soni
on
7/30/2023
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