तब अंतर्मन गाता है...


जब मन ये , कहर बरपाता हैं ।

तब अंतर्मन गाता है।।


तब हर एक बोल भी, उस मन का।

गीत मुकम्मल  कहाता हैं।।


पन्ने उलट के , जब जब ये ।

उस गहन सफर में जाता हैं।।


तब अंतर्मन गाता है।

जब सैलाब उद्वेगों का।।


इस मनोभूमि में आता हैं ।

तब राग ये उठकर आता हैं ।।


तब ये मन -  मंतर दिखाता है ।

तब अंतर्मन गाता है ।।


गाथा अपनी सुनाता है ।

जब उद्वेग चरम पर आता है ।।


जब मन ये , कहर बरपाता हैं ।

तब अंतर्मन गाता है।।



तब अंतर्मन गाता है... तब अंतर्मन गाता है... Reviewed by Abhinav soni on 8/31/2023 Rating: 5

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