सब कुछ सजगता से पोषित हैं ।
कुछ अघोषित हैं ,कुछ घोषित हैं ।।
कौन हैं यहां ऐसा जो ।
ना जीवन मंच पे शोषित हैं ।।
बतलाओ किरदार तो ऐसा ।
जो ना जग पर दोषित हैं ।।
हर जर्रा तो यहाँ मानो ।
लहराती लौ सा जलता हैं ।।
पोषण का ये आलम हैं की।
निशदिन धर्म बदलता है ।।
तब तो पोषण के अंगारों में ।
जीवन पल पल पकता हैं ।।
खुद मानव ही बिक गया हैं ।
अपने ही बाज़ारो में।।
चमकता चेहरा कोई बताओं ज़रा ।
इस जीवन के अंधियारे में ।।
जिसने कालिख ना देखी हो ।
खुदगर्जी के बाज़ारों में ।।
जो ना ठहरा हो शोषित ।
इस जीवन के गलियारों में ।।
शख़्स का ऐसे नाद सुनाओ ।
तुम उन उम्मीदों के बाजारों में ।।
कोई हैं यहां ? जो तोषित हैं ।
उन दो गुट से बगियारों में ।।
बस फर्क यही है दोनों की ।
फितरत के पैमानों में ।।
हैं घोषित इच्छाएं कुछ की ।
तो कुछ की यहाँ अघोषित हैं ।।
वरना दिखलाओ कोई ऐसा ।
जो नही यहां पर रोषित हैं ।।
सब कुछ सजगता से पोषित हैं ।
कुछ अघोषित हैं ,कुछ घोषित हैं...
Reviewed by Abhinav soni
on
8/31/2023
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