बेशक ! तुम ना आओगे....

आना कभी मनोभूमि में,

नूतन अनुभव पाओगे।

हाँ ! भनक हैं तुम्हे भी कि, 

फिर यू रूठे ना रह पाओगे ।

तर्को के जो जाल बिछाएँ,

वो खुद ही क़तर तुम जाओगे।

हाँ ! बेशक तुम ना आओगे ,

जो आए तो आखिर खुदको ;

फिर कैसे समझाओगे।

बोलो ज़रा ! फिर क्या ये ;

कागज़ी चोला नफ़रत का ,

सहज ओढ़े रख पाओगे ?

इसीलिए ना आओगे !

बस ख़ुदको भरमाओगे ! 

पर तुम ना आओगे ।

बोलो ज़रा ! कभी मनोभूमि में आओगे ?

एक बारी जो हुआ आगमन ,

तो कैसे अनुराग ! छुपाओगे ।

फिर मौन भला ! रह पाओगे ?

बोलो ! कभी, क्या मनोभूमि में ,

अपने अन्तस पग लाओगे ?

संवाद की इस गाथा का ,

कब अंतिम अध्याय सुनाओगे ?

या कह दो फिर, स्पष्ट यहीं के अब तुम ना आओगे...


बेशक ! तुम ना आओगे.... बेशक ! तुम ना आओगे.... Reviewed by Abhinav soni on 9/07/2023 Rating: 5

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