ध्यान धरे ना धरे शून्यता, ऐसा कोई ध्यानी नही
शून्य ही हैं नीव सहस्त्र की ,जान अज्ञानी पाए नही
छोड़ना चाहे क्षुद्रतम को, माने तभी विराट को पाएगा
एक बार तो मिल विराट से, क्षुद्रतम स्वंय छूट जाएगा
बड़े बड़े जो स्वप्न हैं देखे,जान पड़े गाथा बेमतलब की
होना खुद से परिचित चाहे , यही बात लगे बस अन्तस् की
ढूंढत ढूंढत थाका प्यारे,
पल भर तो विश्राम को जा रे
विश्राम में ही वो आता प्यारे
सारे बन्धन तोड़ के हा! रे।
हैं जब खोज अनन्त की तोहे
तो ख़ुद का अंत, तू बो... ले,
ऐसे अंत में ही तेरा, अनंत तुझे मिल पाएगा
लम्बी बड़ी है राहे प्यारे, पर तु गहराई में जा रे
भीतर ही वो तुझे दिखेगा, तू तलाश में जिसकी भटके प्यारे
इसको ही बस सूत्र समझना , शेष सब अंधकूप समझना
जिसमें अन्तस् भटकेगा बस,ना राह सही वो पाएगा
मूल्यवान तू जानना प्यारे, समय तेरा जो अनमोल यहां रे
जैसे जहां ये जाएगा वारे , संग दीप्ति वैसी लाएगा प्यारे
अंत तुरंत ना होता जग में, हर पल जिम्मेवार यहां रे
किस्सा कोई बतलाओ जरा ये,
जिसमें पल में हो उजड़ी बहारे।
नीव तो उसकी डाली होगी, कर्मबीज की शक्ल में प्यारे
जिसके लूटने पर तु, आंसू बहाता हैं ये सारे
पोषा होगा उनको अपनी, उन उम्मीदो के सहारे
उसकी उत्पत्ति ही वो बीज है प्यारे
गर्भ में जिसके विध्वंस पुकारे
ध्यान धरे ना धरें शून्यता.....
Reviewed by Abhinav soni
on
8/18/2023
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