उजड़ना ही तो परिणीति हैं यहां बसने की हा प्यारे
आज यहां तू पुलकित मन से , एक जहां बसाएगा
पर ना सोच की तूफ़ां , इस गलियारे ना आएगा
जो नश्वर तू जान के ही ये गुलबाग यहॉ बसाएगा
तब तो ठीक है वरना प्यारे, फंदा गले लगाएगा
आँसू बरसेंगे प्रतिपल ऐसे , होते मेघ तिरोहित जैसे
फिर कर ना कुछ तू पाएगा, जो करना भी चाहेगा
इसलिए वो एक हिदायत , अपना जान के देता हैं
जितने जहां बसाना बेशक , बस अन्तस् में ना उपजाना
ये बसाहट तुमको भीतर, से रुसवा कर जाएगी
सब अफसाने पलक झपकते ,जमींदोज कर जाएगी
यहीं बसाहट बस हैं ऐसी, जो बेघर कर जाएगी
यही बसाहट बस ऐसी जो , जीना दुभर कर जाएगी
हा ! यही बसाहट बस ऐसी जो ,बैरागी तेवर लाएगी
उजड़ेंगे जब हर राग यहाँ, तो कोई सखा ना आएगा
ये मंजर फिर हर इक बन्धन, को रुसवा कर जाएगा
फिर इस क्षण तुम दोष की माला ,किसके गले पहनाओगे
फिर बतलाओ सर किसका ,कलम यहाँ करवाओगे
शीश तुमहारा, कटार तुम्हारी, तुम्हरी ही तो गाथा हैं
जनक तुम्ही इस ध्वंस के प्यारे, फिर मन क्यू कतराता है
इस अधर में तुमको जीवन ,जब कभी ले आता हैं।
तो एक झरोखा अनंत का, तुम्हें आगोश में बुलाता हैं।
पर उस झरोखे के तुम,पार कहां से जाओगे
ये तभी संभव है प्यारे जब
तुम फिर कटार अपनी उठाओगे
कटार उठा कर जो तुम अपना , अहं शीश कलमाओगे
तभी तो उसको संपदा अपनी , भेंट तुम कर पाओगे
तब कल्पित सत्ता के रागों का ,अंत यहाँ कर जाओगे
जो भेंट हुई स्वीकार तो फिर , परम् शून्य को पाओगे
ना उजड़ेगा चमन तब कोई, ना कोई आंधी आएगी
शून्य की उस शरण में फिर ना ,बात कोई तड़पाएगी....
यहीं बसाहट बस ऐसी जो कभी उजड़ ना पाएगी.....
उजड़ना ही तो परिणीति हैं यहां बसने की...
Reviewed by Abhinav soni
on
8/18/2023
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